कभी असमान चुने की जिद लिए बैठा है ,
कभी दूर कहीं सूरज का बसेरा तलाशता है,
कभी कहता है ये ठिकाना अजनबी सा है
तोंह कभी दूरियों मे अपना पन सा है .....
कैसा है मन्न मेरा !!!
कभी तनहाइयों का काफिला,
तोंह कभी महफिलों का शोर मांगता है ,
पागल है !!
अनजाने हे बहुत कुछ चाहता है ..
होकर बेफिक्र नए रंगों को अक्सर पहचानता है !!!
मैं और मेरा पागल मन
