Tuesday, November 16, 2010

मैं और मेरा पागल मन

कभी असमान चुने की जिद लिए बैठा है ,


कभी दूर कहीं सूरज का बसेरा तलाशता  है,
कभी कहता है ये ठिकाना अजनबी सा है 
तोंह कभी  दूरियों मे अपना पन सा है .....
कैसा है मन्न मेरा !!!
कभी तनहाइयों का काफिला,
तोंह कभी महफिलों का शोर मांगता है ,
पागल है !!
अनजाने हे बहुत कुछ चाहता है ..
होकर बेफिक्र नए रंगों को अक्सर पहचानता है !!!

मैं और मेरा पागल मन 

Aarzoo

तारों की ऊंचाई नहीं, चमक चाहिए मुझको,

आसमान की  गहराई चाहिए मुझको.
न तख्ते-इ-ताज न कोई रियासत-राज चाहिए मुझको,
दिल -इ -देहलीज़  मे एक कोना चाहिए मुझको .

मैं तनहा होकर भी बेफिक्र हूँ,

साथ किसी का नहीं चाहिए मुझको,

बस तुम्हारे साथ होने का इक पल का भरम चाहिए मुझको .


आरजू-इ-दिल इतनी हैं ,

हिसाब लगाना न आता मुझको,
हाँ!!! पर हर चाहत की खाविश में शामिल दिल क जज़्बात चाहिए मुझको.

Mere Anubhava

मेरे अनुभवों को मैंने शब्दों मे उकेरा है
आस पास विषयो का डेरा है,
कलम जब हाथ मैं चड़ता है
तोंह खयालो का जाल मन मे बुन्नता है,
कभी शुन्य को चुनता हूँ तोंह
कभी प्रकाश को भी धुनता हूँ.


मुझे पता है मेरी कविताये
न होती कुछ ख़ास है
बस ये तोंह मेरी कोरी बकवास है
पर लिखना मेरा शौक है,
इसलिए कलम पे मेरी धौक है.